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पहले विश्व युद्ध के भारतीय हीरो, बहादुरी के किस्से

Web Title:unsung indian heroes of first world war

(Hindi News from Navbharat Times , TIL Network)

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पहले विश्व युद्ध के भारतीय हीरो, बहादुरी के किस्से
1914 में शुरू हुए प्रथम विश्व युद्ध में अविभाजित हिंदुस्तान के हजारों सैनिकों ने हिस्सा लिया था। युद्ध समाप्ति के दिन को कॉमनवेल्थ देशों में इसे एक ऐतिहासिक दिन के तौर पर याद किया जाता है। इस युद्ध में भारतीय सैनिकों की भूमिका को पूरी दुनिया में सम्मान के साथ याद किया जाता है। आज ही के दिन यानी 11 नवंबर, 1914 को यह युद्ध समाप्त हुआ था। आइए इस मौके पर हम कुछ भारतीय सैनिकों के बहादुरी भरे किस्सों के बारे में जानते हैं जिनको विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया…

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​गब्बर सिंह नेगी

​गब्बर सिंह नेगी

गब्बर सिंह नेगी का जन्म 21 अप्रैल, 1895 को उत्तराखंड के चम्बा में हुआ था। 1913 में वह गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हुए थे। उसी दौरान पहला विश्व युद्ध छिड़ गया था जिसमें गढ़वाल राइफल्स के सैनिकों को फ्रांस भेजा गया।

बहादुरी के किस्से…

वह जिस रेजिमेंट में शामिल थे उसने मार्च, 1915 में न्यू शैपल के युद्ध में हिस्सा लिया। उस समय उनकी आयु मात्र 21 साल थी। 10 मार्च, 1915 को उनकी सैन्य टुकड़ी ने जर्मन सैनिकों के एक ठिकाने पर हमला किया। गब्बर सिंह नेगी अपनी टुकड़ी के साथ मुख्य खंदक में प्रवेश कर गए। उन्होंने दुश्मन को सरेंडर करने पर मजबूर कर दिया। अंत में उनकी भी मौत हो गई। बहादुरी के असाधारण कारनामे के लिए उनको विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था। चम्बा में उनकी याद में हर साल गब्बर सिंह नेगी मेला लगता है जिस दौरान उनके स्मारक पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।

(फोटो: साभार ट्विटर)

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​बदलू सिंह

​बदलू सिंह

बदलू सिंह का जन्म पंजाब के ढकला में हुआ था। वह हिंदू जाट थे। वह भारतीय सेना की 29वीं लांसर्स रेजिमेंट में रिसालदार थे। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उनको पहले फ्रांस भेजा गया था लेकिन बाद में फिलिस्तीन भेजा गया। उनको मरणोपरांत विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था।

बहादुरी का किस्सा…

23 सितंबर, 1918 को फिलिस्तीन की जॉर्डन नदी के किनारे उन्होंने जिस बहादुरी और बलिदान का परिचय दिया, वह बेमिसाल है। सुबह का समय था। उनके स्क्वॉड्रन ने जॉर्डन नदी के पश्चिम तट पर दुश्मन के एक मजबूत ठिकाने पर हमला किया। ठिकाने के करीब पहुंचने पर रिसालदार बदूल सिंह ने देखा कि बाईं ओर एक छोटी से पहाड़ी थी। उस पर दुश्मन के 200 सैनिक और मशीन गनें लगी थीं। वहां से उनके स्क्वॉड्रन पर जोरदार गोलीबारी हो रही थी जिससे उनके साथी काफी हताहत हो रहे थे। उन्होंने हिचके बगैर अपने छह अन्य साथियों को लिया और पहाड़ी पर कब्जा करने के लिए चल पड़े। उन्होंने पहाड़ी पर कब्जा कर लिया और बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को मरने से बचा लिया। इस हमले में वह बुरी तरह घायल हो गए लेकिन उनके मरने से पहले दुश्मन की सभी मशीन गन और पैदल सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया।

(फोटो और टेक्स्ट: साभार GOV.UK)

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छत्ता सिंह

छत्ता सिंह

छत्ता सिंह का जन्म 1886 में उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ था। वह भारतीय सेना की भोपाल इन्फैंट्री में सिपाही थे। 13 जनवरी, 1916 को मेसोपोटामिया (मौजूदा इराक) में वाडी का युद्ध हुआ था। उस युद्ध में उन्होंने बेमिसाल बहादुरी का परिचय दिया था जिसके लिए उनको विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया।

बहादुरी का किस्सा…

युद्ध के दौरान उनके कमांडिंग ऑफिसर बुरी तरह घायल हो गए थे। वह खुले मैदान में बेसहारा पड़े हुए थे। जबर्दस्त गोलीबारी हो रही थी। उस बीच में अपनी जान बचानी मुश्किल थी लेकिन छत्ता सिंह ने कमांडिंग ऑफिसर को यूं ही नहीं छोड़ने का फैसला किया। गोलीबारी के बीच उन्होंने ऑफिसर के लिए खंदक खोदना शुरू किया। जब तक रात नहीं हो गई, उस पांच घंटे तक वह जख्मी ऑफिसर के साथ रहे। उन्होंने कमांडिंग ऑफिसर को बचाने के लिए अपना शरीर आगे कर दिया। जब अंधेरा हो गया तो वह ऑफिसर को सुरक्षित स्थान पर ले आए। 1961 में उनका निधन हो गया।

(फोटो और टेक्स्ट: साभार GOV.UK)

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​दरबान सिंह नेगी

​दरबान सिंह नेगी

उनका जन्म 4 मार्च, 1883 को गढ़वाल के करबारतीर गांव में हुआ था। गढ़वाल राइफल्स में वह नाईक थे। 23-24 नवंबर, 1914 को उनकी रेजिमेंट ने दुश्मन से फेस्टुबर्ट के करीब ब्रिटिश खदंकों पर फिर से कब्जा करने की कोशिश की। इस युद्ध के दौरान उनकी भूमिका के लिए उनको विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया।

उनकी बहादुरी के किस्से कुछ इस तरह से है…

23-24 नवंबर, 1914 की रात थी। नेगी की रेजिमेंट जर्मन सैनिकों के कब्जे से ब्रिटिश खंदकों को आजाद कराने के लिए आगे बढ़ी। दुश्मन की ओर से ताबड़तोड़ गोलियां दागी जा रही थीं। दो बार गोलियां उनके सिर और बाहों में आकर लगी। जोरदार गोलीबारी और गोलाबारी के बीच दरवान सिंह नेगी आगे बढ़े और जर्मन सैनिकों को खंदक से भागने पर मजबूर कर दिया। बाद में वह सूबेदार की रैंक पर सेना से सेवानिवृत्त हुए। 1950 में उनका निधन हो गया। लैंसडॉन, उत्तराखंड में गढ़वाल राइफल्स के रेजिमेंटल संग्रहालय का नाम, उनके सम्मान में रखा गया है।

(फोटो और टेक्स्ट: साभार GOV.UK)

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​गोविंद सिंह

​गोविंद सिंह

गोविंद सिंह का जन्म 7 दिसंबर, 1887 को राजस्थान के दामोई गांव में हुआ था। वह पहले विश्व युद्ध के दौरान दूसरे लांसर्स की घुड़सवार सेना में शामिल थे। 1 दिसंबर, 1917 को कम्बराई के युद्ध में उनके बहादुरी भरे कारनामे के लिए उनको विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया।

उनकी बहादुरी का किस्सा कुछ इस तरह से है…

युद्ध के दौरान उनकी रेजिमेंट दुश्मन से घिर जाती है। रेजिमेंट की पोजिशन बताने के लिए ब्रिगेड मुख्यालय संदेश भेजना जरूरी था। जोरदार गोलीबारी के बीच संदेश पहुंचाना मुश्किल काम था। इस स्थिति में गोविंद सिंह ने यह जिम्मेदारी निभाई। हर बार उनके घोड़े को दुश्मन निशाना बना लेते लेकिन वह हर बार पैदल ही जाकर संदेश छोड़ आते। युद्ध में गोविंद सिंह जिंदा बचे थे जिनका 1942 में निधन हो गया।

(फोटो और टेक्स्ट: साभार GOV.UK)

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​लाला

​लाला

लाला का जन्म 20 अप्रैल, 1876 को हिमाचल प्रदेश में हुआ था। वह भारतीय थल सेना के 41वें डोगरा में लांस नाईक थे। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने मेसोपोटामिया (मौजूदा इराक) में हन्ना के युद्ध में 21 जनवरी, 1916 को बहादुरी की मिसाल कायम की जिसके लिए उनको विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया। उनकी बहादुरी का किस्सा कुछ इस तरह से है…

उन्होंने एक ब्रिटिश ऑफिसर को दुश्मन के करीब जमीन पर बेसुध पाया। वह ऑफिसर दूसरी रेजिमेंट का था। लाला उस ऑफिसर को एक अस्थायी शरण में ले आए जिसे उन्होंने खुद बनाया था। उसमें वह पहले भी चार लोगों की मरहम-पट्टी कर चुके थे। जब उस अधिकारी के जख्म की मरहम-पट्टी कर दी तो उनको अपनी रेजिमेंट के एजुटेंट की आवाज सुनाई दी। एजुटेंट बुरी तरह जख्मी थे और जमीन पर पड़े थे। लांस नाईक लाला ने एजुटेंट को अकेले नहीं छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अपने पीठ पर लादकर एजुटेंट को ले जाना चाहा लेकिन एजुटेंट ने मना कर दिया। उसके बाद वह शेल्टर में आ गए और अपने कपड़े उतारकर जख्मी अधिकारी को गर्म रखने की कोशिश की और अंधेरा होने तक उसके साथ रहे। जब वह अधिकारी अपने शेल्टर में चला गया तो उन्होंने पहले वाले जख्मी अधिकारी को मुख्य खंदक में पहुंचाया। इसके बाद वह एक स्ट्रेचर लेकर गए और अपने एजुटेंट को वापस लाए। उन्होंने अपने अधिकारियों के लिए साहस और समर्पण की अनोखी मिसाल कायम की। लाला का 1927 में निधन हो गया और उनके अंतिम शब्द थे, ‘हमने सच्चे दिल से लड़ा।’

(फोटो और टेक्स्ट: साभार GOV.UK)

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