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Ice Age Women Who Were Involved In Human Exile In The Last Years Of The Glacier Ad | हिमयुग के अंतिम वर्षों में मानवीय पलायन में शामिल थीं महिलाएं


हिमयुग के अंतिम वर्षों में मानवीय पलायन में शामिल थीं महिलाएं

जब से जीवधारियों के जीनोम को पढ़ना और जीन्स को क्रमबद्ध करना संभव हुआ है, तब से मानव विकास क्रम के बारे में कई नए खुलासे हो रहे हैं. अब भारतीय शोधकर्ताओं की ओर से जम्मू-कश्मीर में किए गए एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि प्लाइस्टोसीन या हिमयुग के अंतिम दौर और उसके बाद भी एक जगह से दूसरी जगह होने वाले मानवीय पलायन पूरी तरह पुरुष प्रधान नहीं थे, बल्कि इसमें महिलाएं भी शामिल थीं.

अब तक मिले तथ्यों के आधार पर माना जाता है कि मनुष्य की वर्तमान आबादी के पूर्वजों की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई थी, जो करीब एक लाख वर्ष पूर्व पलायन करके विश्व के विभिन्न हिस्सों में फैल गए. पलायन के प्रमुख गलियारे के रूप में भारत दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल रहा है, जहां अफ्रीका छोड़ने के बाद मनुष्यों की बसावट सबसे पहले हुई.

जम्मू-कश्मीर की बेहद अहम भौगोलिक स्थिति होने कारण यह राज्य इस गलियारे का प्रमुख हिस्सा रहा है. जम्मू-कश्मीर के विभिन्न जातीय समूहों के 83 असंबद्ध व्यक्तियों के डीएनए का अध्ययन करने के बाद कटरा स्थित श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय के शोधकर्ता इस नतीजे पर पहुंचे हैं.

पूर्वजों से विरासत में मिला है माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए 

अध्ययन में माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए को शामिल किया गया है क्योंकि यह डीएनए महिलाओं को ही पूर्वजों से विरासत में मिलता है. मानव विकास के इस क्रम में विभिन्न व्यक्तियों में अनुवांशिक बदलाव होते रहते हैं, इन बदलावों के अध्ययन से वैज्ञानिक उन व्यक्तियों में परस्पर संबंध और उनके वंशक्रम का पता लगाते हैं.

Human genetics

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉ स्वारकर शर्मा ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि ‘इस अध्ययन में मातृवंश समूहों में काफी विविधता पाई गई है और 19 नए मातृ उप-वंश समूहों की पहचान भी की गई है. इससे स्पष्ट होता है कि माइटोकॉन्ड्रियल उत्परिवर्तनों की संख्या भारतीय आबादी में ज्ञात अनुवांशिक बदलावों तक सीमित नहीं है, कई अन्य नए बदलाव भी इसमें शामिल हैं. मातृवंश समूह में कई वंशक्रमों की मौजूदगी हजारों वर्ष पूर्व पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं के पलायन का भी संकेत करती है.’

ज्यादातर पूर्व अध्ययनों में जम्मू-कश्मीर से लिए गए माइटोकॉन्ड्रियल नमूनों का अभाव रहा है, जिस कारण यह निष्कर्ष निकाला गया कि हमारे मातृवंश समूह बेहद कम हैं. इसका तात्पर्य यह है कि हमारे जो पूर्वज इस क्षेत्र में हिमयुग के बाद पहुंचे, उनमें सिर्फ पुरुषों की प्रधानता रही होगी. लेकिन इस अध्ययन से स्पष्ट हो गया है कि हजारों वर्ष पूर्व हुए पलायन में महिलाएं भी शामिल थीं.

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अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि ‘भारत की वर्तमान जनसंख्या के स्वरूप को आकार देने में करीब 8000-10000 वर्ष पूर्व हुए पुरुषों एवं महिलाओं दोनों का पलायन प्रमुख रहा है और भारत में ही जाति व्यवस्था का एक सामाजिक ढांचे के रूप में जन्म हुआ है, न कि इसे किसी तरह के पलायन से जोड़ा जा सकता है.’

8000-10000 वर्ष पूर्व हुए हैं ऐसे पलायन

मनुष्यों की आनुवंशिकी में मातृवंश समूह उस वंश समूह को कहते हैं, जिसके बारे में किसी के माइटोकांड्रिया के गुण सूत्र पर स्थित डीएनए की जांच से पता चलता है. अगर दो व्यक्तियों का मातृवंश समूह मिलता हो, तो इसका अर्थ है कि हजारों साल पूर्व एक ही महिला उनकी पूर्वज रही है, चाहे आधुनिक युग में वे दोनों व्यक्ति अलग-अलग जातियों से सम्बंधित क्यों न हों.

जनसंख्या के भीतर या बाहर प्रवास के कारण किसी स्थान विशेष की जनसंख्या में न केवल नई आनुवांशिक विविधताएं पैदा हो सकती हैं, बल्कि जीन भंडार में भी परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं. भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता के साथ-साथ यहां के जीन भंडार एवं जनसंख्या को आकार देने में विदेशों से होने वाले पलायन और आक्रमणकारियों की भूमिका मानी गई है, पर अभी तक के अध्ययन के अनुसार यह कहा जा सकता है कि ऐसे पलायन 8000-10000 वर्ष पूर्व हुए हैं.

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डॉ शर्मा के अनुसार ‘सिर्फ 83 नमूनों के आधार पर किया गया यह एक शुरुआती अध्ययन है, जिससे मातृवंश की उच्च विविधता के बारे में पता चलता है. नमूनों का आकार बढ़ाया जाए तो कई चौंकाने वाले रहस्यों का खुलासा हो सकता है.’

माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय के अलावा अध्ययनकर्ताओं की टीम में जम्मू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और वाशिंगटन स्थित नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी के दि जेनोग्राफिक प्रोजेक्ट के शोधकर्ता शामिल थे.

शोधकर्ताओं में डॉ स्वारकर शर्मा के अलावा डॉ एकता राय, इंदु शर्मा, वरुण शर्मा, अकबर खान, डॉ परविंदर कुमार, प्रो आर.एन.के. बामजेई और डॉ मिगुएल विलर शामिल थे. यह अध्ययन हाल में शोध पत्रिका साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित किया गया है.

(इंडिया साइंस वायर के लिए उमाशंकर मिश्र की रिपोर्ट)



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