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Delhi Pollution India Should Learn To Control Pollution From Beijing China | #DelhiDoesn’tCare: बीजिंग से सीख ले दिल्ली तो वो सुबह जरूर आएगी, जब न पॉल्यूशन होगा न स्मॉग


#DelhiDoesn'tCare: बीजिंग से सीख ले दिल्ली तो वो सुबह जरूर आएगी, जब न पॉल्यूशन होगा न स्मॉग

विश्वबैंक का अनुमान है कि अगले दो साल में भारत की विकास दर चीन को पछाड़ देगी. विश्‍व बैंक के साल 2018 ग्लोबल इकॉनॉमिक प्रॉस्पेक्ट के मुताबिक अगले दशक में भारत दुनिया की दूसरी उभरती हुई अर्थव्यवस्था के मुकाबले में ज्यादा तेज विकास दर हासिल करने जा रहा है. वहीं हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत साल 2025 तक 7.7 प्रतिशत की सालाना वृद्धि दर के साथ चीन की अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ देगा. आंकड़ों के आइने में आर्थिक विकास बहुत सुंदर दिखाई देता है. इसकी अनुभूति मात्र ही गौरव भर देती है. काश यही संभावना प्रदूषण पर नियंत्रण के मामले में भी जताई जाती.

पिछले दो साल से हर बार दिवाली की अगली सुबह देश की राजधानी में एयर क्वालिटी इंडेक्स खतरनाक स्तर के भी पार कर जाता है. लेकिन प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर दो दिन का शोर अगले 363 दिनों के लिए फिर खामोश भी हो जाता है. आखिर दिल्ली की जानलेवा हवा को लेकर हायतौबा दो-दिनों की नूराकुश्ती और दिखावी कसरत के बाद ठंडी क्यों पड़ जाती है? क्या दिल्ली के प्रदूषण को लेकर हायतौबा मचाने वाली मीडिया, राजनीति करने वाली सियासी पार्टियां और प्रदूषण नियंत्रण का दावा करने वाली सरकारें साल के दो दिनों का इस्तेमाल सालाना उर्स की तरह करती हैं?

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

दिल्ली की हवा खराब होने का आरोप पड़ोसी राज्यों से गुजरता हुआ पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान तक पहुंचा जाता है. लेकिन क्या सिर्फ आरोप लगाने से केंद्र और दिल्ली सरकार की जवाबदेही खत्म हो जाती है?

आखिर जिस चीन के साथ विकास की रेस लगाई जाती है और ग्रोथ रेट में पीछे छोड़ने की बात की जाती है, उसी चीन के शहर बीजिंग की तर्ज पर दिल्ली के प्रदूषण को कम करने की कोशिश क्यों नहीं की जाती ?

दरअसल इसकी बड़ी वजह ये है कि चाहे वो केंद्र हो या फिर दिल्ली सरकार, दोनों के भीतर इच्छाशक्ति नहीं है तो वहीं दूसरी तरफ सरकारों के पास ऐसा कोई लॉन्ग टर्म प्लान भी नहीं है.

ये जुमला ही हो गया है कि दिल्ली में प्रदूषण बहुत है और यहां की हवा में दम घुटता है. लेकिन सवाल उनसे भी पूछा जाना चाहिए है जो इस जुमले का हर साल इस्तेमाल करते हैं. स्मॉग में लिपटी सुबह और शाम देखने के बावजूद लोगों में प्रदूषण के प्रति जागरुकता नहीं है. आम जनता इसके नियंत्रण के लिए क्या भागीदारी निभा रही है इस पर क्या कोई अध्ययन या सर्वे हुआ है?

स्मॉग से घिरी दिल्ली के लिए क्या सिर्फ पराली जिम्मेदार है या पटाखे या फिर साल के वो 363 दिन जब कि हम प्रदूषण को लेकर आंखों पर भी पट्टी बांध लेते हैं?

New Delhi: View of the city enveloped by heavy smog in Patna on Wednesday. PTI Photo (PTI11_8_2017_000253B) *** Local Caption ***

बीजिंग से सीखे इंडिया

दरअसल, प्रदूषण के सामने घुटने टेक देने वाली केंद्र और दिल्ली सरकार को अब चीन से सीखने की जरूरत है. प्रदूषण को तेजी से मिटाने में बीजिंग मिसाल है. साल 2013 में बीजिंग की हवा भी दिल्ली की तरह सांस लेने लायक नहीं बची थी. विकास की दौड़ में बीजिंग प्रदूषण की राजधानी कहलाने लगी थी. बीजिंग में स्मॉग के चलते आसमान नहीं दिखाई देता था. जहरीली हवा की वजह से स्कूलों को बंद करना पड़ता था और लोग मॉस्क लगाकर रहने को मजबूर थे. लेकिन चीन ने प्रदूषण से निजात पाने के लिए गंभीर इच्छाशक्ति दिखाई. साल 2013 में बीजिंग में वार्निंग सिस्टम अपनाया. नेशनल एयर क्वालिटी एक्शन प्लान लागू किया.

प्रदूषण को लेकर चीन हाईअलर्ट पर रहा. सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही को कम किया. प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर भारी जुर्माना लगाया तो लाखों गाड़ियों को जब्त भी किया. इसके अलावा बीजिंग में 500 मीटर चौड़े कॉरिडोर बनाए गए जहां साफ हवा प्रवाहित की गई. उन कॉरिडोर के आसपास किसी भी तरह का कंस्ट्रक्शन नहीं होने दिया गया. कई जगहों पर ऊंचे-ऊंचे एयर प्यूरीफायर बनाए गए जो कि हवा में मौजूद डस्ट पार्टिकल्स को साफ करने का काम करते हैं वहीं ऑक्सीजन के लिए लाखों पेड़ लगाए गए.

A smoke rises from a chimney of a garbage processing plant on the outskirts of the northern Indian city of Chandigarh December 8, 2010. Many rich countries, suffering weak growth and budget cuts, want emerging economies led by fast-growing China and India to do far more to reflect their growing power, including greater oversight of their curbs on greenhouse gas emissions. REUTERS/Ajay Verma (INDIA - Tags: ENVIRONMENT IMAGES OF THE DAY) - GM1E6C819JJ01

चीन की सरकार ने बीजिंग में कार्बन उत्सर्जन कम करने पर बेहद जोर दिया. बीजिंग में कोयला जलाने पर सख्त रोक लगाई गई. कोयले की खदानों को बंद किया गया तो साथ ही सीमेंट और स्टील उत्पादन में पूरी तरह पाबंदी लगाई गई. अब हालात ये हैं कि ग्रीन पीस जैसी पर्यावरण से जुड़ी संस्थाएं कहती है कि बीजिंग के प्रदूषण में 50 फीसदी की गिरावट आई है.

बीजिंग की तरह दिल्ली में क्या कभी नीला आसमान दिखेगा? क्या वो सुबह कभी आएगी जब न स्मॉग होगा न मॉस्क?

बीजिंग की ही तरह दिल्ली में भी जरूरी है कि सड़कों पर प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर सख्ती से कार्रवाई हो. वहीं सड़कों पर निजी वाहनों की आवाजाही कम करने के लिए लोगों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के प्रति जागरुकता फैलाना जरूरी है. आज दिल्ली में कम से कम 10 हजार बसों की जरुरत है लेकिन मौजूद सिर्फ तीन हजार बसें ही हैं.

1 नवंबर से 10 नवंबर तक निर्माण कार्य पर रोक लगी है. दिल्ली में कंस्ट्रक्शन की वजह से हवा में डस्ट पार्टिकल में सबसे ज्यादा इजाफा होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाली निर्माण सामग्री को ढंक कर क्यों नहीं रखा जाता है? सड़क किनारे की धूल को उड़ने से रोकने के लिए वैक्यूम क्लीनिंग मशीनों की बेहद जरूरत है जो कि अबतक नजर नहीं आई हैं. वहीं सड़कों पर उड़ती धूल को रोकने के लिए पानी की बौछारें भी कंस्ट्रक्शन साइट पर छोड़ी नहीं जाती हैं.

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सिर्फ गाड़ियों के ऑड-ईवन फॉर्मूला और कंस्ट्रक्शन पर रोक लगा कर ही पॉल्यूशन पर कंट्रोल नहीं किया जा सकता है. दिल्ली में तकरीबन बीस हजार फैक्ट्रियां चल रही हैं जिनकी वजह से दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है. हालात ये है कि दिल्ली की स्टील इंडस्ट्री से होने वाले प्रदूषण पर लगाम कसने में नाकाम रहने पर केजरीवाल सरकार पर एनजीटी ने 50 करोड़ का जुर्माना लगाया है. साफ है कि प्रदूषण को रोकने के नियमों का दिल्ली सरकार पालन नहीं करवा सकी है.

भलस्वा लैंडफिल साइट में लगी आग दिल्ली प्रशासन की निष्क्रियता की मिसाल है. खुले में कूड़ा जलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की जरुरत है. नरेला और बवाना जैसे औद्योगिक इलाकों में खुलेआम कूड़े के ढेर जलाए जाते हैं जिनसे दिल्ली की हवा में जहर घुलता है लेकिन लोगों में उस प्रदूषण को लेकर कोई विरोध नहीं दिखाई देता है.

सबसे बड़ा सवाल आम जागरुकता का भी है. ऐसा लगता है कि लोगों की जिंदगी में प्रदूषण भी हवा-पानी की तरह हो गया है. सर्दियों के मौसम में जब रुकी हुई हवा के बीच प्रदूषण से दम घुटता है तब लोग प्रदूषण पर चिंता दिखाते हैं. यही वजह है कि प्रदूषण भी अब 12 महीने के कैलेंडर में तीन दिवसीय इवेंट सा हो गया है जिस पर टीवी में बहस, चौराहों पर चर्चा, मंत्रिमंडल में बैठक और योजनाओं पर अधिकारियों का अखाड़ा लगता रहता है. उसके बाद पूरे साल प्रदूषण का मुद्दा पराली के धुएं में कहीं गुम हो जाता है.



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