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China Action Plan On Air Polluation Compare To India Rt | कभी दिल्ली जितना ही प्रदूषित था बीजिंग, लेकिन इस तरह बदले हालात


कभी दिल्ली जितना ही प्रदूषित था बीजिंग, लेकिन इस तरह बदले हालात

दिल्ली में वायु प्रदूषण की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है. दिवाली पर हुई आतिशबाजी ने इस प्रदूषण को और भी ज्यादा बढ़ा दिया है. ऐसे में दिल्ली की हवा जहरीली हो गई है और आम जनता को नुकसान पहुंचा रही है. जो लोग सिगरेट नहीं पीते, उनके शरीर में भी 20-25 सिगरेट का जहर वायु प्रदूषण के जरिए जा रहा है. यह दावा विशेषज्ञों ने किया है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को न मानते हुए दिवाली की रात जमकर आतिशबाजी हुई जिसका असर पूरे दिल्ली-एनसीआर में देखा गया. धुंध की मोटी चादर के छा जाने से आम आदमी को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. दिवाली के बाद सुबह औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स 374 तक पहुंच गया था जोकि सबसे खराब श्रेणी में एक है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन के बीजिंग शहर में भी कुछ समय पहले तक ऐसा ही हाल हुआ करता था लेकिन वहां की सरकार ने इस समस्या का समाधान निकाला और आज वहां पहले जैसी परिस्थितियां नहीं हैं. चीन में वायु प्रदूषण की
शुरुआत साल 2000 से हुई थी लेकिन 2013 से चीनी सरकार के प्रयासों की वजह से हवा की गुणवत्ता कई गुना बढ़ गई.

बीजिंग में 2013 में PM 2.5 स्तर 50 से लेकर 400 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के बीच गया लेकिन अधिकतर 250 के नीचे ही रहा. वहीं अगर दिल्ली की बात करें तो नवंबर 2013 से जनवरी 2014 तक के बीच का स्तर औसतन 240 था
जोकि दिल्ली में 575 तक पहुंच गया था.

बुधवार शाम को बीजिंग का स्तर 38 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा जबकि दिल्ली में यह स्तर 300 था जोकि 10 गुना ज्यादा है. वहीं चीन ने वायु प्रदूषण कम करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए. उसने 2013 में नेशनल वायु क्वालिटी ऐक्शन प्लान शुरू किया. बीजिंग के आस पास जो कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्र थे, उन्हें बंद कर दिया गया.

इसके अलावा सड़कों पर कारों की संख्या पर पाबंदी लगा दी गई. सार्वजनिक वाहनों को बढ़ावा दिया गया और उनके किराये को कम किया गया. इसके अलावा चीन में यह भी नियम है कि अगर प्रदूषण का स्तर बढ़ा तो स्थानीय सरकारों को भी जुर्माना देना पड़ता है.

वहीं अगर भारत की बात करें तो प्रदूषण कम करने के लिए सरकारों को कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है. यहां सार्वजनिक वाहन कम हैं और जो मौजूद हैं, उनका किराया ज्यादा है. इसके अलावा प्रदूषण बढ़ने में अहम भूमिका
निभाने वाली पराली को जलाने के मामले में राज्य एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं. कानून भी ज्यादा कठोर नहीं हैं जिसकी वजह से लोग उस पर ध्यान नहीं देते.



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