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Ajay Pandey Blog on Sad demise of Professor GD Agarwal Environment Swami Gyan Vishya Sanand


चित्रकूट के पावन मार्गों पर अनायास देखा कि एक वृद्ध खादी पहने हुए, पैरों में चप्पल साइकिल लिए हुए पैदल जा रहे हैं. किसी ने बताया कि ये ही जीडी अग्रवाल हैं…  आईआईटी कानपुर के जाने माने प्रोफेसर और विश्वविख्यात पर्यावरणशास्त्री. आईआईटी कानपुर में 17 साल तक सिविल इंजीनियरिंग पढ़ा चुके हैं. देश-विदेश की न जाने कितनी संस्थाओं के सलाहकार रहे, पहली बार आईआईटी कानपुर में पर्यावरण विज्ञान में इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू करवाई और उन्होंने ही गंगा को लेकर हमारी आस्था को वैज्ञानिक आधार दिया. उनके व्यक्तित्व की शालीनता देख मन आदर से भर गया. 

इसके बाद जब भी उन्हें चित्रकूट में कहीं देखता तो आदर से चरण स्पर्श करता. प्रोफेसर (चित्रकूट में लोग उन्हें इसी नाम से बुलाते थे) ने कभी मुझे सिर उठाकर भी नहीं देखा होगा. हमेशा हरि ॐ कहकर आगे बढ़ जाते थे. अपनी व्यक्तिगत छवि को छुपाने में वो माहिर थे. बेहद सरल और सादा जीवन. चित्रकूट में पैदल चलते या साइकिल से चलते. खुद से खाना बनाते और एक छोटे से कमरे में गुजारा करते. यह सब करते हम लोगों ने उन्हें वर्षों देखा. शायद पहली बार उनसे एकांत में चर्चा का अवसर मिला था प्रमोद वन में. बोले थे कि तुम्हारी सोच अच्छी है. एक योग्य गुरु प्राप्ति की कामतानाथ जी से प्रार्थना करो. कालांतर में सुना कि वे संन्यास दीक्षा लेकर गंगा मां की सेवा में जीवन बिता रहे हैं.

फिर एक सूचना मिली कि मनमोहन सरकार में गंगा जी की उपेक्षा से क्षुब्ध होकर वे आमरण अनशन पर थे और स्वास्थ्य खराब होने के कारण एम्स में भर्ती हैं. मैं एम्स में उनसे मिलने गया. उन्होंने कहा कि उन्हें अपने जीवन का मोह नहीं है. जब आप लोगों को मुझ एक व्यक्ति के जीवन की इतनी चिंता है, तो फिर सोचिए कि गंगा मां की कितनी चिंता सभी को करनी चाहिए. वो तो करोड़ों लोगों के जीवन की रेखा हैं. उनके लिए रोजी और रोटी, दोनों हैं. उस समय हम सभी मनमोहन सरकार को लेकर गुस्से से भरे थे.

आज लगता है कि गो और गंगा के नाम पर चल रही वर्तमान सरकार भी इस मामले में कुछ वैसा ही काम कर रही है. मनमोहन सिंह की सरकार ने अग्रवाल साहब के पिछले अनशन को समाप्त करवाते हुए उत्तरकाशी में समस्त निर्माण कार्य रुकवा दिये थे तथा गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया था, लेकिन इस सरकार ने तो उनकी कोई सुध ही नहीं ली. मीडिया को क्या कहा जाए जो छोटे-छोटे महत्वहीन मुद्दों पर घंटों व दिनों की बहस दिखाता रहता है, लेकिन इतने बड़े वैज्ञानिक के अनशन पर खमोश रहा.

सरकारें बदल गईं, समय बदल गया, लेकिन न तो मां गंगा बदलीं और न ही प्रोफेसर, जो स्वामी साणंद के नाम से जाने जाते थे. 86 वर्ष की आयु में आमरण अनशन पर बैठे थे कि मां गंगा की रक्षा करने का वचन देने वालों ने फिर मां गंगा को भुला दिया. पुलिस उनके अनशन को खत्म करने के लिए जिस तरह उन्हें उठाकर ले गई, वो दृश्य भी बड़ा विदारक है. क्या गंगा मां अपने बेटे को कभी कभी ऐसे भी बुलाती हैं.

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एक सवाल ये है कि जब सरकार ने नमामि गंगे जैसी महत्वाकांक्षी और अभूतपूर्व योजना शुरू की है, तो फिर प्रोफेसर को अनशन करने और अपनी जान देने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल लगता है कि सरकार को गंगा की चिंता कम और अपने वोटों की चिंता ज्यादा है. जैसे गंगा के किनारे घाटों की जरूरत किसे है – गंगा मां को या लोगों को. घाटों का सौंदर्यीकरण, रोशनी और बड़ी-बड़ी देव मूर्तियां जनभावनाओं को पुष्ट करती हैं. भावनाओं को किनारे रखें, तो इनमें से किसी से भी गंगा का भला नहीं है. गंगा तो तब बचेगी जब उसका प्रवाह अविरल रहे और जल निर्मल रहे. यानी उसकी धारा को रोका न जाए और उसमें मिलने वाले नालों को बंद कर दिया जाए. इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया.

जो लोग मेरी बात को शंका की निगाह से देखेंगे, उनके लिए मेरे गृह नगर का ही एक उदाहरण है. पिछले सप्ताह कानपुर में गंगा के पार मेरे गृह नगर गंगाघाट में उन्नाव जिला प्रशासन ने नमामि गंगे के तहत गंगा आरती का आयोजन किया. इस अवसर पर आरती के साथ ही 11 हजार दिए प्रवाहित किए गए. जो प्रशासन गंगा में एक फूल माला या लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति भी प्रवाहित नहीं होने देता, उसने 11 हजार दिए प्रवाहित करने का कार्यक्रम खुद कराया. लेकिन रुकिए… बात सिर्फ इतनी नहीं है. दीपदान के साथ ही गंगा की रेती में भव्य आतिशबाजी का इंतजाम किया गया. कई जिले के मशहूर आतिशबाज बुलाए गए. पल भर की फुलझड़ी के बाद पूरा गंगातट बारूद की गंध से भर गया. अगर ये लोग गंगा मां के प्रति संवेदनशील होते तो क्या गंगा की रेती को बारूद से भरते. ऐसा तो केवल नमामि गंगे को तमाशा बनाने वाले ही कर सकते हैं.

…और जनता को क्या कहा जाए. अगर एक भी इंसान इस तमाशे पर प्रश्न खड़ा करता, तो ये जनता उसे ही उल्टा खड़ा कर देती. आशा ही कर सकता हूं कि प्रोफेसर का बलिदान जनता की इन तंद्रा को तोड़ेगा और साथ ही सत्ताधारियों को भी अपने वादों, अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराएगा. प्रोफेसर कहते थे कि उनके जीवन का मूल्य नहीं है, मूल्य गंगा का है. प्रोफेसर अब नहीं हैं, लेकिन गंगा अभी भी हैं. उन्हें अभी भी बचाया जा सकता है. वो नहीं बचीं, तो हम भी नहीं बचेंगे. खुद को बचाने के लिए गंगा को बचाइए. गंगा को तमाशा न बनाइए, खुद तमाशबीन न बनिए. प्रण लीजिए.

(लेखक एरिक्सन इंडिया ग्लोबल सर्विसेज में इमरजेंसी हेड हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)



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