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दीपोत्सव पर खान-पान की खास परंपराएं, शेफ हरपाल सिंह की जुबानी बंगाल से केरल तक का सफर






लाइफस्टाइल डेस्क. जब भी दिवाली की बात होती है तो दीयों की रोशनी और पटाखों के साथ ही आपके जेहन में सबसे ज्यादा जो चीज आती होगी, वह लजीज और स्वादिष्ठ पकवान ही होते होंगे। हमारे यहां दिवाली पर अलग-अलग हिस्सों में खान-पान को लेकर अलग-अलग तरह की परंपराएं मौजूद हैं। आज दिवाली पर कुछ ऐसी ही परंपराओं की बात करेंगे, जिनके बारे में आमतौर पर उत्तर भारतीय लोग कम ही परिचित हैं। शेफ हरपाल सिंह सोखी बता रहे हैं पूर्व-दक्षिण भारत के पकवानों और राजस्थान के अन्नकूट महोत्सव के बारे में…

बंगाल: भूत के डर से बचने के लिए खाते हैं ‘शाक’
सबसे पहले पूर्व में चलते हैं। पूर्व का सबसे बड़ा राज्य है बंगाल। यहां दिवाली के अगले दिन ‘शाक’ खाई जाती है। इसको लेकर बंगाल में कहावत प्रचलित है : ‘ना खेले भूते धरबे’। यानी अगर तुम ये नहीं खाओगे तो भूत तुम्हें डराएंगे। चरक संहिता में भी कहा गया है कि कार्तिक के महीने में यमलोक के दरवाजे खुले रहते हैं। इससे बुरी आत्माएं भी इधर से उधर भटकती रहती हैं। तो उन बुरी आत्माओं से निपटने के लिए खुद को मजबूत बनाना होगा और इसके लिए हमें शाक खानी होगी। बंगाल में बनाई जाने वाली पारंपरिक शाक में अलगअलग तरह की 14 पत्तेदार सब्जियों और अन्य हरी सब्जियों का उपयोग किया जाता है, जैसे : पालक, चौलाई, लाल चौलाई, कलमी, अरबी या अरबी के पत्ती, मेथी, बथुआ की भाजी, सरसों की भाजी, कद्दू, मूली के पत्ते, लौकी, परवल के पत्ते, जूट के पत्ते और मटर के दाने। हालांकि शाक की अपनी कोई यूनिक रेसीपी नहीं है। हर घर में अपने-अपने तरह से शाक बनती है। लेकिन बनती जरूर है।

मणिपुर : महिलाएं दावत के लिए पिता के घर जाती हैं
अब पूर्व से थोड़ा और आगे यानी मणिपुर चलते हैं। यहां दिवाली पर ‘निंगोल चक्कूओबा’ नामक पर्व मनाया जाता है। यह खासकर मैती समुदाय के बीच काफी लोकप्रिय है। यह आमतौर पर दिवाली पर्व के एक या दो दिन पहले या बाद में पड़ता है। इसे भाई-दूज का मणिपुरी संस्करण कह सकते हैं। ‘निंगोल’ का मतलब होता है ‘बेटी’ और ‘चक्कूओबा’ का मतलब होता है ‘दावत’। इस पर्व पर विवाहित महिलाएं दावत के लिए अपने पिता के घर जाती हैं जहां उन्हें पिता या भाई उपहार भी देता है। दावत में नगा थोंगबा (फिश करी), इरोम्बा (स्पाइसी चपनी), ऊटी (एक तरह की दाल), सोइबम माथेल (बांस के पत्तों की डिश), हेई थोंगबा (फलों की स्वीट) जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।

तमिलनाडु : खाली पेट मरुंडू खाने का रिवाज
अब एकदम दक्षिण ओर चलते हैं। पहले तमिलनाडु की बात। यहां भी दिवाली पर कई तरह के पारंपरिक पकवान बनते हैं। चूंकि पकवान हेवी होते हैं तो उन्हें पचाने की भी व्यवस्था पहले से ही कर ली जाती है। इसके लिए वे बनाते हैं ‘मरुंडू’। इसे हर घर में दिपावली वाले दिन खाली पेट खाते हैं और सभी के लिए खाना अनिवार्य होता है। ‘मरुंडू’ को अजवाइन, खसखस के दानों, सोंठ, शहद, गुड़े, घी और नट्स से बनाया जाता है। वहीं केरल में दिवाली के त्योहार को भगवान धन्वंतरि की पूजा के रूप में मनाया जाता है। इस दिन गुड़ और सोंठ से प्रसाद बनाया जाता है जिसे धन्वंतरि को अर्पित किया जाता है। फिर यही प्रसाद घर के सभी सदस्य खाते हैं।

राजस्थान : अन्नकूट महोत्सव में 20 क्विंटल चावल का भोग
राजस्थान के नाथद्वारा का अन्नकूट महोत्सव प्रसिद्ध है। दिवाली के अगले दिन शुक्लपक्ष प्रतिपदा को यहां अन्नकूट महोत्सव आयोजित होता है। यहां अन्नकूट लूटने की परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है। अन्नकूट में करीब 20 क्विंटल पकाए गए चावल का पर्वत बनाया जाता है और उसका श्रीनाथजी को भोग लगाया जाता है। इसके अलावा श्रीखंड, हलवा, विभिन्न प्रकार के लड्डू, मोहनथाल, पापड़ सहित 56 तरह के व्यंजन तैयार किए जाते हैं। अन्नकूट महोत्सव को देखने के लिए दूर-दूर से पर्यटक भी यहां बड़ी संख्या में आते हैं। पुराणों की मानें तो अन्नकूट की परंपरा ब्रज से शुरू होती है। ब्रजवासी इंद्र की पूजा करते थे। लेकिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन की पूजा करने को कहा। इससे नाराज इंद्र ने लगातार बारिश करके ब्रज में हाहाकार मचा दिया। तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर ब्रज को बचाया। इसी के बाद वहां 56 भोग की परंपरा शुरू हुई।

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