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खून में प्लेटलेट्स गिरने से नहीं, पानी की ज्यादा कमी होने पर हो सकती है मौत





हेल्थ डेस्क. क्या डेंगू से मरीज की मौत भी हो सकती है? क्या इसका कोई इलाज नहीं है? या डेंगू होने पर क्या मरीज को तुरंत किसी अच्छे हॉस्पिटल में ले जाना चाहिए? डेंगू को लेकर कई तरह के मिथक हैं जिससे यह बीमारी हौव्वा हो गई है। डॉ. अव्यक्त अग्रवाल से जानते हैं डेंगू से जुड़ी वो बातें भ्रम को दूर करती हैं और इसे निपटने में मदद करती हैं।

  1. जवाब: डेंगू को लेकर सबसे बड़ी भ्रांति तो यह है कि डेंगू होने पर मरीजों में बहुत तेजी से प्लेटलेट्स कम होते जाते हैं और इससे मरीज की मृत्यु तक हो सकती है। इसी वजह से डॉक्टर तुरंत डेंगू के मरीज को प्लेटलेट्स बढ़ाने की दवाएं देते हैं। कई बार प्लेटलेट्स भी चढ़ाते हैं। लेकिन सच तो यह है कि प्लेटलेट्स की कमी मरीज़ में मृत्यु का कारण नहीं होती।

    • विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रोटोकॉल के अनुसार दस हज़ार प्लेटलेट्स से कम होने पर ही प्लेटलेट्स चढ़ाई जानी चाहिए और अधिकांश अच्छे चिकित्सक भी यही करते हैं। तो सवाल यह उठता है कि फिर खतरा कहां है?
    • प्लेटलेट्स से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है पीसीवी या हेमाटोक्रिट। डेंगू में मृत्यु रक्त प्रवाह में द्रव्य की कमी से होती है, जिसे शॉक कहते हैं। जब खून में द्रव्य की कमी होती है तो पीसीवी बढ़ने लगता है और यही मौत की वजह बनता है। इसका मतलब यह है कि डेंगू के मरीज में पानी की कमी नहीं होने दी जाए।
    • डेंगू के मरीजों को पानी और ओआरएस का घोल ज़्यादा से ज़्यादा पिलाना चाहिए। इससे गंभीर से गंभीर मरीज भी बच जाएगा।
  2. जवाब: डेंगू स्वयं की रोगप्रतिरोधक क्षमता से ठीक होता है। डॉक्टर का तो एक ही काम होता है कि पांच से दस दिन तक डेंगू के मरीज की स्थिति को स्थिर रखना और उसमें पानी की आपूर्ति को बनाए रखना।

    • पीसीवी बढ़ने अथवा खतरे के लक्षण उत्पन्न होने पर मरीज़ को तुरंत भर्ती कर ड्रिप के माध्यम से ठीक किया जाता है। मैं अपना अनुभव बताता हूं। साल 2003-04 के दौरान मैं एम्स नई दिल्ली में सीनियर रेजिडेंट था। तब हमने मात्र ड्रिप के माध्यम से डेंगू के सैंकड़ों मरीजों को ठीक किया था। यानी डेंगू का उपचार किसी भी छोटे शहर में ठीक-ठाक हॉस्पिटल में आसानी से किया जा सकता है। बस वहां ड्रिप चढ़ाने की सुविधा हो जो अक्सर होती ही है। साथ ही पीसीवी नाम की सस्ती और सुलभ जांच की व्यवस्था हो।
    • ऐसा चिकित्सक, जो कि द्रव्य के प्रोटोकॉल का पालन करना जानता हो। मरीज़ में पानी की शुरुआती आपूर्ति नहीं करके उसे दूसरे शहर ले जाना ख़तरनाक हो सकता है, क्योंकि बड़े अस्पताल में होने से अधिक महत्वपूर्ण है जल्दी कम होते द्रव्य की आपूर्ति करना। हां, बुखार को कम करने के लिए एस्पिरिन, ब्रूफेन जैसी दवाएं न लेकर पेरासिटामोल लेना चाहिए।
  3. जवाब: डेंगू प्राय: दो बार में आने वाला बुखार है। अर्थात पांच से छह दिन बुखार होने के बाद एक से दो दिन के लिए मरीज़ बुखार रहित हो जाएगा। इससे मरीज़ के परिजन और डॉक्टर यह मानने की गलती कर सकते हैं कि मरीज ठीक हो गया है। लेकिन यही वह समय होता है, जब मरीज में द्रव्य की कमी होने की सर्वाधिक आशंका होती है। इसलिए बुखार न होने के अगले कम से कम 24 घंटों तक अच्छी निगरानी रखनी जरूरी है। खासकर यह देखें कि हाथ पैर ठंडे तो नहीं हो रहे।

    • इसके अलावा एक बड़ा खतरा डेंगू वायरस के प्रकार से भी जुड़ा है। डेंगू वायरस के चार प्रकार होते हैं- एक, दो, तीन, चार… एक प्रकार के वायरस से संक्रमण होने पर व्यक्ति उस वायरस के प्रति जीवन भर के लिए एंटीबाडी के माध्यम से रोगप्रतिरोधक क्षमता हासिल कर लेता है। किंतु अगर भविष्य में वह कभी भी दूसरे प्रकार के वायरस से संक्रमित होता है, तो उसके शरीर में पहले से मौजूद एंटीबाडी अपने ही अंगों को नुक़सान पहुंचाने लगती हैं। इससे मरीज़ गंभीर स्थिति में भी पहुंच सकता है।
  4. जवाब: हर साल बारिश के बाद डेंगू के मामले बढ़ते हैं। बारिश खत्म होने के कुछ दिनों बाद तक भी प्रकोप बना रहता है। डेंगू से बचाव का कोई भी टीका उपलब्ध न होने की वजह से इस मच्छर से बचाव ही मुख्य बचाव है। डेंगू के मच्छरों से एक साल से छोटे बच्चों, वृद्धों, डायबिटीज के मरीज़ों को बचाने की अधिक आवश्यकता है।

    • स्किन पर चकत्ते, जी मिचलाना, तेज बुखार, तेज सिरदर्द, शरीर में दर्द, लो-बीपी और तेज बुखार होने पर डॉक्टर से मिलें।
    • कुछ बातों को ध्यान में रखने की जरूरत है जैसे डेंगू मादा एडीज इजिप्टी मच्छर के काटने से होता है। इन मच्छरों के शरीर पर धारियां होती हैं। ये दिन में, खासकर सुबह काटते हैं।
    • डेंगू जुलाई से अक्टूबर में सबसे ज्यादा फैलता है। एडीज इजिप्टी मच्छर बहुत ऊंचाई तक नहीं उड़ पाता।
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      liquid supply is more important than platelets in dengue know symptoms



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