Home » India » आरबीआई विवाद / सरकार ने पहली बार धारा 7 का इस्तेमाल किया, इस्तीफा दे सकते हैं गवर्नर पटेल

आरबीआई विवाद / सरकार ने पहली बार धारा 7 का इस्तेमाल किया, इस्तीफा दे सकते हैं गवर्नर पटेल






नेशनल डेस्क, मुंबई. सरकार ने अगर एक विशेष कानूनी धारा का इस्तेमाल करते हुए रिजर्व बैंक को कोई दिशा-निर्देश जारी किए तो गवर्नर उर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं। यह आरबीआई एक्ट की धारा 7 है, जिसके तहत सरकार ने पहली बार तीन पत्र रिजर्व बैंक को भेजे हैं। इसमें आरबीआई और सरकार के बीच सिर्फ सलाह-मशविरे का जिक्र किया गया है। इस धारा के तहत सरकार को आरबीआई के लिए निर्देश जारी करने का भी अधिकार है। एजेंसी ने सूत्रों के हवाले से खबर दी है कि केंद्र ने सरकारी बैंकों की हालत, लिक्विडिटी की कमी और पावर सेक्टर के एनपीए के मुद्दे पर धारा 7 के तहत रिजर्व बैंक को पिछले दिनों पत्र भेजे हैं। इन मुद्दों पर सरकार और आरबीआई के बीच मतभेद हैं। ताजा विवाद पर वित्त मंत्रालय का कहना है कि आरबीआई की स्वायत्तता बनाए रखना जरूरी है और सरकार इसका सम्मान करती है।

धारा 7 के तहत आरबीआई को निर्देश दे सकती है सरकार
आरबीआई एक्ट की धारा 7 कहती है कि सरकार जनहित से जुड़े गंभीर मुद्दों पर आरबीआई गवर्नर से सलाह-मशविरा करने के बाद कुछ निर्देश जारी कर सकती है। आजाद भारत में आज तक इस धारा का कभी इस्तेमाल नहीं किया गया है। धारा 7 के दो हिस्से हैं। पहला सलाह-मशविरा करना, दूसरा दिशा-निर्देश जारी करना। सरकार के तीन पत्र अभी सलाह-मशविरे से ही जुड़े हैं। अगर सरकार ने धारा 7 के दूसरे हिस्से यानी दिशा-निर्देशों का पहली बार इस्तेमाल किया तो गवर्नर पद छोड़ सकते हैं।

विवाद का बड़ा मुद्दा है पीसीए
आरबीआई ने प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) की रूपरेखा के तहत कुछ नियम तय किए हैं। यही सरकार और आरबीआई के बीच विवाद का सबसे बड़ा मुद्दा है। रिजर्व बैंक ने 12 बैंकों को त्वरित कारवाई की श्रेणी में डाला है। ये नया कर्ज नहीं दे सकते, नई ब्रांच नहीं खोल सकते और ना ही डिविडेंड दे सकते हैं। सरकार पीसीए नियमों में ढील चाहती है ताकि कर्ज देना बढ़ सके। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा था कि बैंकों की बैलेंस शीट और ना बिगड़े, इसलिए रोक जरूरी है।

सरकार-आरबीआई के बीच विवाद के अन्य मुद्दे
अंतर-मंत्रालय समिति ने अलग पेमेंट-सेटलमेंट रेगुलेटर की सिफारिश की है। रिजर्व बैंक इसके खिलाफ है। उसका कहना है कि यह आरबीआई के अधीन हो। इसका प्रमुख आरबीआई गवर्नर ही हो।एनपीए और विल्फुल डिफॉल्टरों पर अंकुश लगाने के लिए आरबीआई ने 12 फरवरी को नियम बदले। कर्ज लौटाने में एक दिन की भी देरी हुई तो डिफॉल्ट मानकर रिजॉल्यूशन प्रक्रिया शुरू करनी पड़गी। सरकार ने इसमें ढील देने का आग्रह किया, लेकिन आरबीआई नहीं माना।

  • नीरव मोदी का पीएनबी फ्रॉड सामने आने के बाद सरकार ने रिजर्व बैंक की निगरानी की आलोचना की तो आरबीआई गवर्नर ने ज्यादा अधिकार मांगे ताकि सरकारी बैंकों के खिलाफ कारवाई की जा सके।सरकार रिजर्व बैंक से ज्यादा डिविडेंड चाहती है ताकि अपना घाटा कम कर सके। आरबीआई का कहना है कि सरकार इसकी स्वायत्तता को कम कर रही है। अभी इसकी बैलेंस शीट मजबूत बनाने की जरूरत है।

वित्त मंत्रालय ने कहा- कई मुद्दों पर करते हैं राय-मशविरा
वित्त मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि सरकार आरबीआई एक्ट के तहत रिजर्व बैंक की स्वायत्तता जरूरी है। सरकार भी इसका सम्मान करती है। कई मुद्दों पर आरबीआई से राय-मशविरा किया जाता है। लेकिन, सरकार ने कभी इन्हें सार्वजनिक नहीं किया। सिर्फ आखिरी फैसलों के बारे में जानकारी दी जाती है।

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर ने सरकार पर सवाल उठाए थे

पिछले शुक्रवार को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने रिजर्व बैंक की स्वायत्तता के मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि जो सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता की अनदेखी करती है, उसे नुकसान उठाना पड़ता है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मंगलवार को कहा था कि साल 2008 से 2014 के बीच बैंकों ने मनमाने तरीके से लोन बांटे। आरबीआई इस पर निगरानी नहीं रख पाया। हालांकि, उन्होंने विरल आचार्य की टिप्पणी का जिक्र नहीं किया। मंगलवार को पीएमओ ने रिजर्व बैंक के रवैए पर नाराजगी जताई थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों ने कहा था कि सरकार रिजर्व बैंक की स्वायत्तता और आजादी का सम्मान करती है। लेकिन उन्हें भी अपनी जिम्मेदारी समझनी पड़ेगी।

  • पीएमओ के अफसरों का कहना है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आरबीआई ने इस तरह की बात सार्वजनिक की। केंद्रीय बैंक से यह उम्मीद नहीं थी। अधिकारी गवर्नर उर्जित पटेल को इस विवाद के लिए जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि पटेल को सितंबर 2019 के बाद कार्यकाल में विस्तार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।

आरबीआई और सरकारों के बीच पुराने विवाद
साल 2014 से 2016 के बीच मोदी सरकार और रघुराम राजन के बीच ब्याज दरों और राजन के बयानों को लेकर अनबन रही थी।साल 2008 से 2012 के दौरान यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम और तत्कालीन आरबीआई गर्वनर डी सुब्बाराव के बीच भी मतभेद सामने आए थे। दोनों के बीच ब्याज दरों और कर्ज को लेकर मतभेद थे।साल 2004 से 2008 के दौरान पी चिदंबरम और तत्कालीन आरबीआई गवर्नर वाई वी रेड्डी के बीच विदेशी निवेशकों पर टैक्स, ब्याज दरों और निजी बैंकों में एफडीआई के मुद्दे को लेकर विवाद हुआ था।

   <br /><br />
        <a href="https://f87kg.app.goo.gl/V27t">Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today</a>
    <section class="type:slideshow">
                    <figure>
            <a href="https://www.bhaskar.com/national/news/govt-cites-never-used-powers-for-resolving-issues-with-rbi-5976655.html">
                <img border="0" hspace="10" align="left" style="margin-top:3px;margin-right:5px" src="https://i10.dainikbhaskar.com/thumbnails/891x770/web2images/www.bhaskar.com/2018/10/31/bank_1540986445.jpg" />
            <figcaption>Govt cites never-used powers for resolving issues with RBI</figcaption>
            </a> 
        </figure>
                </section>



Source link

, , , , , , , ,

Leave a Reply

%d bloggers like this: